ऐसी होती है मा
चांद से ज्यादा शीतल है, अग्नि से ज्यादा तपती है।
कोमल स्पर्श पाकर जिसका होता जन्नत का एहसास है,
लोरी मे जिसके दुनियाभर का सुकून है।
दर्द मे भी रहती जिसके चेहरे पर मुस्कान है,
खुद भूखी रहकर भरे सबका पेट है।
भेदभाव न माने किसी मे, ऐसी ममता की तस्वीर है वो।
अपना छोड़कर पहले दुसरो की सोचती, ऐसी त्याग की मूर्त है वो।
कहने को शब्द नही है, जिसके बलिदान का,
समझने मे उसे अभी भी थोड़े नादान है हम।
पता नही किस मिट्टी की बनी है,
झेलती दर्द सारा फिर भी दुआ देती है मा,
ऐसी होती है मा,ऐसी होती है मा।।